
स्वस्थ व्यक्ति वह है जो शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से स्वस्थ हो। जिसका शरीर तंदुरुस्त हो, हर्स्ट-पुष्ट हो और मन एकदम निर्मल, शांत, स्वच्छ है, उसी को हम एक स्वस्थ व्यक्ति कह सकते हैं। तन और मन के स्वास्थ्य के लिए हम निम्न उपाय नियमित रूप से कर सकते हें। हमें बीमारी तभी लगती है जब हमारे आचार, विहार और बिचारों में कुछ गड़बड़ होती है। इनहि को ठीक करने से बीमारी भी ठीक हो जाती है। हमारा शरीर इन बीमारियों का संकेत समय समय पर देते रहता है। हमें इन्हें पहचानना आना चाहिए और पहचान कर समय रहते जल्दी उचित इलाज कराना चाहिए, तभी हम आजीवन स्वस्थ रह सकते हें।
ये निम्न नीयम सभी के लिए हें, राजा हो या रंक, पुरुष हो या स्त्री, बाबू हो या ऑफिसर, मिनिस्टर हो या एमपी/एमएलए, शाशक हो या जनता। यही नहीं, ये नियम डौक्टरों, वैध्यों, रोगियों, भोगियों और योगियों पर भी समान रूप से कारगर हें और सभी को स्वस्थ जीवन जीनी के लिए इन नीयमों का पालन करना पड़ता है।
स्वस्थ जीवन के लिए ये निम्न सुनहरे नियम हमें अपनी ज़िदगी में अपनाने हैं।
1. शरीर एवं पर्यावरण की स्वच्छता:
शरीर और पर्यावरण की स्वच्छता से हमारा मतलब है हमें अपने शरीर को नित्य शुद्ध रखना है, स्वच्छ रखना है, नित्य स्नान करना है शरीर में मैल से कीटाणुओं की वृद्धि न हो इसके लिए साबुन से पूरे शरीर को स्वच्छ रखना है। पीने का पानी स्वच्छ होना चाहिए। पानी को यदि उबाल के ठंडा करके पिएंगे तो अच्छा है। यदि आप गुनगुना पानी नहीं पी सकते हैं तो आपको नॉर्मल पानी पीना चाहिए, ये स्वास्थ्य के लिए बेहतर है, लेकिन ठंडा पानी आपको कभी भी नहीं पीना चाहिए। घर में पर्याप्त मात्रा में हवा और सूर्य का प्रकाश आना जरूरी है, इससे वातावरण में किटाणुवों की वृद्धि नहीं होती है। घर का पर्यावरण – घर के अन्दर भी साफ-सफाई आवश्यक है। दांतों की सफाई के लिए आपको सवेरे उठने के बाद और रात्रि में सोने से पहले दांतों को ब्रश करना आवश्य है। वैसे ही आंखों को स्वस्थ रखने के लिए दिन में कम से कम तीन चार बार नेत्र स्नान करना चाहिए। नेत्रस्नान करने से आँखों की थकान, जलन दूर हो जाती है। सुबह नेत्रस्नान करने से आपकी नीद दूर हो जाएगी और रात को सोने से पहले नेत्र स्नान करने से अच्छी नीद आएगी। जैसे शरीर की बाहरी सुद्धि जरूरी है वैसे ही शरीर की अंदुरनी सुद्धि भी जरूरी है। प्रतिदिन हमारा पेट / इंटेस्टाइन साफ रहनी चाहिए, उनमे मल जमा नहीं होना चाहिए, मल जमा होने से बीमारियां हो जाती हैं – संक्षिप्त में कहें तो हमें हमारी ज्ञानेंद्रियाँ और कर्मेन्द्रियां स्वस्थ रखनी हें।
2. संतुलित एवं सात्विक आहार:
संतुलित और सात्विक आहार भी मनुष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है हम जो अन्न खाते हैं जो भोजन लेते हैं उसका असर हमारे पूरे शरीर पर और मन पर होता है इसीलिए योग में कहा गया है “जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन” हमें खाना सात्विक ही लेना चाहिए, क्योंकि मनुष्य के शरीर की संरचना शाकाहारी भोजन के लिए ही बनी है। मनुष्य की आंतें लंबी होती हैं जबकि जो मांसाहारी प्राणी हैं उनकी आंतें छोटी होती हैं। और मांसाहारी जीवों के दांतो की बनावट भी अलग होती है। खाना खूब चबा-चबा कर खाएँ ताकि अन्न का पाचन मुंह से ही शुरू हो जाए। उससे पाचन जल्दी हो जाता हैं। हम कितना खाते हैं यह इंपोर्टेंट नहीं है इंपॉर्टेंट यह है कि हम कितना पचा सकते हैं। हमें उतना हि भोजन लेना चाहिए, जितना हम पचा सकते हें। सात्विक भोजन ही लेना चाहिए जो सुपाच्य है। हमारे आहार में मौसमी साग-सब्जी, फल इत्यादि सभी कुछ होने चाहिए । मौसमी सब्जियों का उपयोग करेंगे तो वह ज्यादा बेहतर है, लाभ प्रद है। पानी भी हमारे शरीर को टाइम टाइम पर प्रचुर मात्रा में मिलते रहना चाहिए। खाना खाते समय पानी नहीं पीना चाहिए, बल्कि खाना खाने के एक घंटा पहले और बाद में जितना चाहिए उतना पानी पी सकते हें
3. गहरी और संतुलित नीद:
मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए गहरी नींद भी बहुत जरूरी है। हम दिन भर काम करने के बाद शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाते हैं, गहरी संतुलित नींद से हमारे दिमाग और शरीर को आराम मिल जाता है। यदि हमें रात को गहरी नींद मिल जाए तो हम प्रात: ज्यादा फ्रेश महसूस करते हैं। यदि गहरी नींद ना मिले तो हमें दिन भर थकान और खुमारी ही महसूस होती है। अनिद्रा का मुख्य कारण मानसिक तनाव, चिंता है। बीमारी के कारण भी व्यक्ति को नींद ठीक से नहीं आ पाती है, जिससे और भी रोगों का जन्म होता है। अतः हमें मन को हमेशा शांत रखने के लिए जो कुछ भी करना पड़े, जैसे ध्यान साधना इत्यादि, ये सब कुछ करना चाहिए जिससे हम गहरी नींद का आनन्द ले सकते हें। हम कितने घंटे सोते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि हमें कितने घंटे गहरी नींद मिली है, क्योंकि कुछ व्यक्ति 4 घंटे की गहरी नींद के बाद ही एकदम स्वस्थ / फ्रेश हो जाते हैं, लेकिन कुछ लोग बिस्तर पर 9 घंटे भी पडे रहे हों तो भी उनकी नींद पूरी नहीं हो पाती है। शरीर में फिर भी थकान व्याप्त रहती है। इसीलिए, शारीरिक और मानशिक अच्छे स्वास्थ्य के लिए गहरी व संतुलित नींद बहुत जरूरी है।
4. शारीरिक व्यायाम
शारीरिक ब्यायाम करने से हमारे शरीर के स्नायू फ्लैक्सिबल रहते हें, शरीर में खून और ऑक्सिजन का संचार प्रचुर मात्र में होते रहता है। नियमित रूप से व्यायाम करने से शरीर में वात, पित्त और कफ, जो त्रिदोष हें संतुलित बने रहते हें और बीमारियाँ नहीं पकड़ती हें। व्यायाम न करने से नस नाड़ियों, रक्त वाहनियों में चर्बी जम जाती है जिससे खून पूरे शरीर में ठीक से नहीं जा पता है। खून और ऑक्सिजन की कमी के कारण हार्ट की, ब्रेन की, फेफड़ों, लीवर और अन्य अवयवों की कार्य करने की क्षमता कम हो जाती है । व्यायाम की कमी के कारण मोटापा बढ़ता है, और डायबटिस, थायरौइड इत्यादि रोगों के होने की संभावना बढ़ जाती है। खुली हवा में तेजी से चलने या मंद गति से दौड़ने से भी सारे शरीर को व्यायाम मिल सकता है।
अतः कम से कम आधा घंटे का नियमित व्यायाम जरूरी है।
5. व्यसनों से मुक्ति
दुर्व्यसनों के कारण भी आजकल बहुत से लोग रोग ग्रसित हें। व्यसन जैसे बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, शराब, चरस, गाँजा, अफीम, मोरफीन, मेंडरेक्स, गर्द इत्यादि नशीली चेजें। इन सबके सेवन से हमारे शरीर पर बुरा असर पढ़ता है। इन व्यसनों से मानव को शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से हानि पहुचती है। स्वस्थ जीवन के लिए इन सभी व्यसनों से मुक्त रहना आवस्यक है।
6. मन की शांति व तनाव मुक्त जीवन:
मन का शांत रहना इसलिए बहुत जरूरी है क्योंकि कहा गया है बीमारियों का मूल कारण मानशिक तनाव ही है। तनाव के कारण मनुष्य के हाव भाव बदल जाते हें। चेहरे का रंग फीका हो जाता है। मानशिक अशांति या तनाव से हमारा पाचन तंत्र भी गड़बड़ा जाता है और सिर दर्द, एसिडिटि, अल्सर, हाइ ब्लडप्रेसर, डायबेटीज़ और चर्मरोग जैसे अनेक बीमारियाँ शरीर में पैदा हो जाती हें। तनाव मुक्त जीवन जीने के लिए हमें जीवन में दिव्य गुणो को, जैसे शोच, संतोष, तप, स्वाध्याय, इत्यादि को अपनाने की जरूरत है। मानशिक शांति के लिए हमें ध्यान और जप का सहारा लेना चाहिए। अतः मानशिक शांति से हम बीमारियों को दूर भगाने के अलावा कार्य कुशलता की शक्ति को भी बढ़ा सकते हें और निरोगी रह के अच्छे कार्य कर सकते हें।
7. सकारात्मक विचार या पॉजिटिव एट्टीट्यूड (दृष्टिकोण)
हमारे मन की स्तिथि का आधार हमारे विचारों पर होता है। अक्सर ऐसा देखा गया है की हम जैसा सोचते हें वैसा ही हो जाता है। इसीलिए गुरुजन हमेशा पॉज़िटिव सोचने की सलाह देते हें। भय, हताशा, ईर्ष्या आदि के कारण किए गए कार्य नकारात्मक विचार तनाव उत्पन्न करते हें और शांति, सच्चाई, आशा, स्नेह आदि के कारण किए गए कार्य, सकारात्मक विचार और स्वास्थ में वृद्धि करते हें। योगी अपने मन पर काबू करके किसी भी परिस्तिथी में अपने विचारों को पोजेटिव दिशा में ले जा सकते हें और खराब से खराब परिस्तिथी का सामना कर सकते हें। ये सब हमारे एट्टीट्यूड (विचारधारा) के ऊपर निर्भर करता है। अपने मन की इच्छया शक्ति के अनुरूप हम अपने विचारों को पॉज़िटिव या नेगेटिव दिशा में ले जा सकते हें, क्योंकि ये हमारे ऊपर निर्भर करता है की किस परिस्तिथी में हम कैसे आचरण कर रहे हें। एक ही परिस्तिथी, एक ही सिचुएशन में अलग अलग लोग अलग अलग ढंग से व्योहार करते हें, पेस आते हें ये सब उनके अपने अपने एट्टीट्यूड के ऊपर निर्भर करता है। अतः always be positive, whatever may be the situation.
8. संतुलित व्यक्तित्व
वैसे मनुष्यों के आचार, विचार, व्यवहार के आधार पर उनको दो भागों में बांटा जा सकता है, 1) अंतर्मुखी- जो ज्यादा मिलनसार नहीं हें, अपने में ही रहते हें, कम बोलते हें और 2) बाह्यमुखी- जैसे जो दूसरों से मिलने में ज्यादा आनंदित होते हें, इत्यादि। अपने सुस्वास्थ के लिए, हर मनुष्य को परिस्तिथियों के अनुरूप, आंतर्मुखता और बाह्यमुखता में बैलेन्स करना आना चाहिए।
9. परमात्मा में विश्वास एवं डॉक्टर की सलाह
परमात्मा – अर्थार्थ जिस भी भगवान को आप मानते हें उनमें अटूट विश्वास रखना चाहिए। इससे हमारा मनोबल बढ़ता है। आत्म शक्ति बढ़ती है। हमारे बढ़े हुवे मनोबल के अनुरूप हम किसी भी परिस्तिथी का मजबूती से मुक़ाबला कर सकते हें। कोई भी बीमारी से उभर सकते हें। कभी कभी देखा गया है की दवाई से भी दुवा ज्यादा काम कर जाती है।
हमें समय समय पर अपने शरीर की डॉक्टरी जांच (जैसे बीपी, डायबटीज़, हार्ट, लीवर, कैंसर, दाँत,आँख,कान, नाक, मुँह इत्यादि) भी कराते रहना चाहिए, जिससे किसी भी बीमारी के लक्षण जल्दी पकड़ में आ जाएँ और टाइम रहते उसका इलाज हो सके।
नोट : शरीर में बीमारी का ज्ञान होने पर भी लाभ तभी होगा जब आप उचित समय पर उचित उपचार करायेंगे/ अपनाएँगे और अपने आचार,विचार और व्यौहार में परिवर्तन लाएँगे, अन्यथा बीमारी ठीक होने में समय लग सकता है। खाली योग, प्राणायाम करने से ही लाभ नहीं होगा जब तक आप पथ्य का पालन नहीं करेंगे, क्योकि शरीर पोषण तो हमारे भोजन के intake (quality & quantity) के ऊपर निर्भर करता है।
उपरोक्त लेख अभी एक सारांश के रूप में प्रस्तुत किया है , अगले लेखों में एक एक विषय पर पूर्ण विस्तृत रूप से जानकारी दी जाएगी।

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