धर्म क्या है
धर्म क्या है ? यह बहुत बड़ा गहन विषय है, लेकिन हमें धर्म को जानने की जरूरत हे और जानना भी चाहिए। । अलग अलग गुरुजनों ने इसे अलग अलग रूप से परिभाषित किया  है।

भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे पुरानी और सबसे समृद्ध संस्कृति मानी जाती है। यहाँ धर्म का अर्थ अन्य देशों की तरह रिलीजन या सम्प्रदाय नहीं माना जाता है। यहाँ धर्म को कर्म से जोड़ा जाता है। 

दार्शनिकों ने धर्म के दो रूप कहे हैं-

1. सहज धर्म     2. कर्तव्य धर्म।

1. सहज धर्म:- सहज धर्म का अर्थ होता है- प्राणियों की सहज स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ। जैसे- अग्नि का धर्म है- ऊर्जा का प्रसारणजल का धर्म है- शीतलता प्रदान करनाप्यास बुझाना आदि। इस आधार पर मनुष्य का धर्म होता है- मानवता की गरिमा का निर्वाह करना। अब मानवता क्या होती है – मानवता है प्रेम, दया, करुणा, सहिशुणता, मदद इत्यादि। 

2. कर्तव्य धर्म:- धर्म का दूसरा स्वरूप मनुष्यों के आदर्श कर्तव्यों से जुड़ा है। जैसे- राजा का धर्म प्रजा की रक्षापोषण और न्याय की व्यवस्था प्रदान करना है। शिक्षक का धर्म है जन- जन को शिक्षित बनाने की योग्यता एवं कुशलता अर्जित करके उसे मूर्त रूप देना है। इसी तरह विद्यार्थी का धर्म है, विद्या की दोनों धाराओं को, अभ्यास और अनुभव में लाना। अतः धर्म हमें एक अनुशाषित जीवन जीने की कला शिखाता है ।

भगवान राम ने धर्म की परिभाषा रामायण में बताई है कि किसी को खुशी देने से बड़ा कोई धर्म नहीं है और किसी को दुख देने से बड़ा कोई अधर्म नहीं है। 

हम आज तक जानते थे कि हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई इत्यादि ये सब धर्म है, लेकिन ये सच नहीं है – ये तो सिर्फ मजहब हें।  दुनिया का कोई भी काम अगर किसी की भलाई के लिए किया जाता है तो वह धर्म है।  केवल राम का नाम लेना धर्म नहीं है।  आप भगवान राम की पूजा तो रोज करते हैं पर उनकी बताई हुई बातें नहीं मानते हैं, अपने जीवन में उनका आचरण नहीं करते हें, तो भगवान राम जी भी आप पर खुश नहीं होंगे, ये पक्की बात हे। 

भगवान की बात आप गीता, वेद,पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत, कुरान  या बाइबल जैसे ग्रन्थों से मालूम कर सकते हैं लेकिन आपको उनके बताए हुवे रास्ते पर चलना है यदि कोई भी काम दुनिया की भलाई के लिए करते हैं, तो वह भगवान का ही कार्य है, भगवान की पूजा है, ऐसा समझना चाहिए।

धर्म के बारे में यदि हम जानने की कोशीश करें, तो  हमें धर्म, दर्शन और अध्यात्म ये तीन शब्द सुनने / पढ़ने में आते हैं।  तीनों ही शब्दों का अर्थ अलग-अलग है लेकिन यहां हम सिर्फ धर्म की बात करेंगे और जानेंगे की आखिर धर्म की परिभाषा क्या है। हिंदू सनातन सिद्धांत धारा में धर्म, अर्थ ,काम और मोक्ष में, धर्म को ही प्रथम स्थान दिया गया है।  

धर्म एक संस्कृत शब्द है। वैसे धर्म को अंग्रेजी में रिलीजन और उर्दू में मजहब कहते हैं। धर्म का अर्थ है धारण करने वाला। जैसे, हम किसी नियम पर उपवास करते है। कई लोगों का कहना है कि धर्म के नियमों का पालन करना, धर्म को धारण करना है, जैसे सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, इत्यादि यम-नियमों का पालन करना ही धर्म है। सत्य ही धर्म है, और धर्म ही सत्य है।

इसीलिए हिंदू धर्म में कहा गया है - सत्यम शिवम सुंदरम।

इस दार्शनिक भाव से देखें तो,  धर्म के  उपरोक्त  कानून और  शिक्षा,  सभी संप्रदायों और रीलिजनों को  लागू  होती हें, सभी को उनका पालन करना चाहिए, मानवता के कल्याण के लिए । मझहब के कानून भिन्न हो सकते हें अपने अपने मजहब के अनुसार , जिन्हें दूसरे मझाब के लोगों को पालने की बाध्यता नहीं है।

अतः धर्म ही सर्वोपरि है ।

हमारे इस ग्रुप में बहुत से आचारी , पंडितजी लोग जुड़े हें वो हमें धर्म , यानि हिन्दू धर्म से संबन्धित अलग अलग रीतियों , कुरीतियों, प्रथावों, धार्मिक पर्वों,इत्यादि के बारे में समय समय परे बताते रहेंगे।
धन्यवाद।

महेश चन्द्र नैल्वाल 
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